हम और परम आत्मा।
हम एक जीव हैं,और परम आत्मा हमारे जीवन का निर्वाह करने के लिए, कुदरत से मिलने वाली हमारी सभी जरूरतें हैं। इसी इन जीवन की सभी जरूरतों को पा कर अपने जीवन को, या सभी के जीवन को सूखाले से सूखाला,तंदरुस्त,और आनद मई कैसे एक ऐसी विवस्था या गवर्नमेंट के सिस्टम से बनाया जाए यही हमारी सभ से बड़ी कामना है और में समझता हूँ कि ऐसी कामना रखने वाला ही हर इंसान धार्मिक होता है और उसका सच्चा धरम [नेचर] होता है,परम आत्मा का बंदा होता है , नहीं तो और कुछ भी नहीं है ,बाकी तो सभ यह हिन्दू,मुस्लिम,सिख, ईसाई,जैन और बोध वगैरा, पूजा पाठ करने वाले घरों में गोलकों का वोपार करने वाले,वेहलड़ साधू,संत,पाखंडी गुरु लोग और पॉलिटीशंज, काला धन समेटने वाले तो सिर्फ एक दुसरे को धोखा देने का सिर्फ धंदा और परपंच ही कर रहे और सिर्फ अधरम का करिया ही कर रहे हैं ।इसी लिए आज यह अशान्तिया जीवन की यह दुर्दशा हो गई है। दबे कुचले,जालमों दवारा जुलम सहते हुए, अच्छे विचार रखने वाले और और कुछ अच्छा और सच्चा काम करने वाले लोग, एक जुट हो कर विचार क्रांति करने वाले निडर और बुद्धि जीवी लोगों दवारा, क्रांति किये बगैर ऐसी बिगड़ी हुई विवस्था का सुधार होना असंभव है।
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