एहसास ऐ जिंदगी।
ओ जीवों में बोलने और गाने वाले ,साजों में संगीत सुनाने वाले, पेड़ों से शां शां और झरनों से मीठी आवाजें निकालने वाले,बादलों से बिजली कड़कने की आवाजों से डराने वाले,हमारे अंदर विचार और कल्पना करने वाले, समझने और कोंसेप्ट बनाने वाले,सभी चाहतों को पूर्ण करने वाले ,सपने दिखाने वाले ,दुःख सुख का एहसास करने वाले,आनंद और नींद का सुख भोगने वाले,जीभा से भोजन के हर तरह के सवाद परखने वाले और अंदर से सारा बाहरी जगत निहारने वाले, तुझ को दुनिया मंदिरों,मस्जिदों,गुर्दवारों और गिरजा घरों में हजारों सालों से ढूंढ़ती आई है पर जिन को भी तूने अपने होने का एहसास कराया है उन्हों ने तो जीवन में रहते हुए ,अपने ही घर या आसमान के नीचे और अपने ही शरीर के मदिर में तुम्हारा एहसास किया है और तुम्हारा धन्य किया है । तू तो हमेशा ही इनके साथ रहा है ,तेरी वजह से ही तो इन की सवास चल रही है तो फिर यह दुनिया अपनी झूठी शोहरत,अहंकार और धन के लोभ लालच और पावर की भूख में इतनी अंधी कियूं हो गई है ? कियूं नहीं देख और समझ पाती कि तुम तो इनके विवहार को हमेशा से इनके ही साथ रह कर देख रहे हो ।
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