मन किया है ?
मन हमारे सभी प्राणियों के अंदर की हमारे भोजन,पानी और ऑक्सीजन की परिकिरिया से बने हुए धुंए और भाफ का मिश्रण है,जिस को मेडिकल साइंस वाले फ्री रेडिकलज का नाम देते हैं और जिस को अगर बेहतर नाक से या मुँह से बाहर ना निकाला जाए तो हमारे अंदर तूफ़ान पैदा कर देता है और हमारे शरीर और हमारे मतषक में अनंत विकारों का कारन बनता है। हमारे बोलने का कारन भी यही है ,और काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार का कारन भी एहि है। जीवन के सभी दुखों और झगड़ों का कारन भी यही मन ही है। गियानियों/ योगियों ने इसी मन को बाहर निकलते रहने के लिए ,प्राणायाम,सिमरन,जाप,पाठ और मंतर पढ़ने की विधियां वगैरा बताई हुई हैं जो सिर्फ एक पैसे कमाने का धंदा है ,पर यह नेचुरल ही हमारे बाहर वाले स्वास के निकास के साथ ही निकलते रहना चाहिए। यह ऐसे ही है कि जैसे हमारी कार या स्कूटर से अगर एग्जॉस्ट निकलना थोड़ा हो जाए या बंद हो जाए तो इंजिन का किया हाल हो जाता है।
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