जीवन भी किया है ?
में मिटटी का एक ढेला हूँ ,अंत में मिटटी/राख में मिल जाऊंगा,
हर तरफ मेरे पानी के बादल और अट्मॉस्फेर के गैसेस की हवा घूमती रहती है।
इसी बादल और हवा के मिश्रण में से में सवास लेता रहता हूँ और अपने खून के जरिये सभी सेलों के इस कम्यून को धियान दवारा ऑक्सीजन देता रहता हूँ और इन जीवों के जीवन का खियाल रखता हूँ।
सूर्या की रौशनी मुझे यह असिस्तव दिखाती रहती है और मेरा जीवन मार्ग निर्धारित करती रहती है।
ऐसे ही जीवन गुजरता जाता है दिन रात गुजरते जाते हैं,सभ अंग काम करते जाते हैं ,
कब तक है यह जिंदगी कुछ पता नहीं ? जैसे जीवन रखे, जिए जाते हैं।
जो कुछ भी लम्हें हैं जिंदगी के ख़ुशी ख़ुशी,बे फ़िक्री में गुजार दे,
ना कुछ लेके आए थे ना कुछ लेके जाएंगे इस दुनिया को सराए समझ कर गुजार दे।
No comments:
Post a Comment