एक नज़र का एक विचार।
हम एक ही असिस्तव के एक धड़कते हुए कण हैं किया ?
जिस का कोई धरम नहीं कोई जात नहीं, हिरदे की धड़कन हैं किया ?
यहां लेने देने को जो भी है ,सभ उसी असिस्तव का है ,
ना हम कहीं से लाए थे और ना हम कहीं ले जाएंगे।
जो ऊपर उछालोगे ,वही झोली में गिर जाएगा ,
जो बादल भाफ बन कर ऊपर जाएगा वही ठंडा हो के बारिश बन कर नीचे गिर जाएगा ।
मेरा मुझ में कुछ नहीं जो कुछ है सभ तेरा,
तेरा तुझ को अर्पण किया लागे है मेरा, गाते चले जाएंगे।
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