हे मेरे प्राण आधारे।
हे ओसियन [समुन्दर ] से ऊपर को आकाशों में, मन के भाव [भाफ] के बादल बन कर, उड़ कर,जाने वाले,
ऊपर जा कर,पानी बन कर फिर नीचे शीतल करती ,बारिश और बर्फ बन कर,गिरने वाले, तुम कौन हो ?
ऊंचे पहाड़ों पर बर्फ के गलेशियर बन कर बैठे, फिर सूरज की गर्मी से ढल कर,नदीऔर दरिययायों में बहने वाले,
बहते बहते चश्मों से गिरते ,मन मोहक बन कर,इस धरती को हरा भरा करने वाले ,अंत में ओसियन [समुन्दर] में मिलने वाले तुम कौन हो ?
हम सभ जीवों के लिए इस धरती से अन्न पदार्थ उपजाने वाले, हमारी सभ जीवों की मुँह सुखाती पियास भुजाने वाले,
हमारे सवासो से आ कर,हमारे खून में घुल कर,हमारे शरीर के सभ सेलों में जा कर इनको जीवत रखने वाले तुम कौन हो ?
तुम कौन हो ? में तुम्हें ढून्ढ ढूंढ कर, खोज खोज कर जब थक गया था, तो चैन आराम से बैठ कर,या लेट कर जब सोचना बंद कर दिया तो एक दम मेरी साइंटिफिक चेतना की रौशनी का फ़्लैश हुआ कि तुम ही तो मेरे भोजन,पानी, अट्मॉस्फेर की ऑक्सीजन,नाइट्रोजन,सब एटॉमिक पार्टिकल्ज,मैग्नेटिज्म और सूर्य की रौशनी से मिल कर बने , मेरे प्राण आधारे हो, जिस को यह धरम गुरु मुझे कुछ कुछ, उलटे पुल्टे नामों से बोल बोल कर,किताबों में लिख कर, मुझे उलझा कर , मेरा उल्लू बना रहे थे। में तुम्हें किस एक नाम से पुकारूँ ? ,तुम ही तो मेरे सभ कुछ ही हो, तुझ बिन और कुछ है ही नहीं ।
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