Sunday, July 9, 2023

O PRAKRITI AUR ASISTAV.

 ओ प्रकृति और असिस्तव। 

ओ प्रकृति और असिस्तव तू ही मेरा सभ कुछ है, तू ही है मेरी शान,

तुझ से ही यह मेरा शरीर है,तुझ से ही चल रही है, हर पल इसकी जान। 

तेरी मिटटी में  मिल जाएं ,तेरे पियार में ऐसे घुल जाएं ,हम सभ  बन जाएं एक सामान,

ना रहे कोई भी अंतर,न कोई पूजा न कोई मंदिर,यह सभ आडम्बर हो जाएं ख़तम तमाम।

हम सभ  प्रकृति के अलग-२ तरह के फूल हैं,अलग-२  सुगंध लिए अलग अलग रंग लिए,

यह अंतर डाल दिए हैं इस शैतानी,अभिमानी,मूरख, अज्ञानी  मनुष्य ने जिस का धंदा चौपट अब हो रहा है तमाम।   


  


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