मूलनिवासी होश में आओ।
हम एक ही धरती के वासी हैं,और एक ही जैसा इस के अनाज का भोजन, इसका पानी और इसकी हवा से स्वास लेते है,चाहे हम बाहर के कोई भी फैशन कियूं ना करें,पर हैं तो सिर्रफ इंसान ही। हमारी साइकोलॉजी अलग अलग हो सकती है पर हम यह बेकार के धर्मों में कैसे बंट गए हैं ? कही हमें कोई आरएसएस और बीजेपी के मोहन भगवत,मोदी और शाह जैसे हिन्दू आतंकी और जुटेरे तो नहीं, अपनी सत्ता को कायम रखने के लिए और हमें लूटने के लिए यह सभ कम्युनल षड यंत्र खेल रहे हैं ?
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