हमारे मन और ईश्वर का विज्ञान ।
हमारा मन पानी है,जिसकी इच्छाओं के बादल बन कर हमारे भाव बनते हैं जो अपनी इच्छाओं की पूर्ती के लिए इधर उधर मारे फिरते हैं और जिनसे हमारे आकाश में अँधेरा छा जाता है और थक हार कर गरज कर बारिश बन कर अमृत की वर्षा करते हैं या अपने घर जहां से चले थे वहीँ वापिस आ जाते हैं और फिर यह बादल मिट जाते हैं और सूर्य की रौशनी लिए,शुद्ध आकाश परगट होता है और शान्ति पाते हैं। इसी कुदरती शान्ति का नाम ही अनंत धर्मों के हो रहे धन्दों ने, ईश्वर का नाम रखा है और इस शांति को पाने की प्रकिरिया का नाम स्पिरिचुअलिटी और रिलिजन [धरम] दिया है।
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