होश और बे होशी।
होश और बेहोशी, जीवन की चेतना और नींद या बेहोशी के दो किनारे हैं। और यह काम हमारा मन यानि जीवन का शरीर के अंदर का पानी करता है। यह पानी जब हमारे शरीर में भाफ [इमोशन] बन कर हमारे दिमाग की तरफ उड़ान करता है तो हमारी होश के आकाश की रौशनी में अँधेरा छाने लगता है और दिमाग में पहुँच कर बिलकुल गुढी नींद में या बेहोशी में डूब जाता है,जिस को धार्मिक या स्पिरिचालिस्ट लोग समाधी का नाम देते हैं, जब तक हमारी आँखों से फिर बाहर से रौशनी प्रवेश नहीं करती और इस अँधेरे को नहीं मिटा देती । रौशनी ही हमारी बेहोशी और अँधेरे को हटाने की एनलाइटनमेंट है, साइंस है हमारी चेतनता है । इसी लिए नानक कहते हैं -मिटी धुंद जग चानन होया नानक [चानन-सूर्य] परगटिया,मतलब जब नीचे वाली धुंद/बादल ख़तम हो जाती/जाते है तो रौशनी/चेतनता आ जाती है। रौशनी /सत्य का दिया तो आकाश में सारा दिन जगता ही रहता है।
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