ओ माटी के पुतले ।
ओ माटी के पुतले,तू बैठा,खड़ा, लेटा या चल रहा है, किसकी जगह में ?
तेरे हर तरफ वही है, जिस को तू भगवान्,वाहेगुरु,अल्लाह या गॉड कह कर पुकार रहा है, पर तेरी देखने की आँख तेरे पास खो गई है।
वही भगवान् तुझे हर वकत संभाले हुए है ,तेरी हर जरूरत को तुझे जीने के लिए तुझे बकश रहा है।
तू कहाँ ,कोनसे, अपने ही दवारा ही बनाए हुए ईटों,पथरों के मदिरों,गुर्दवारों ,मस्जिदों,और चर्चों में उसे ढूंढ रहा है ?
उस आँख की नज़र को पैदा करले,जो उस निर- आकार को देख सके जो हर जगह है, उस के बगैर और कोई जगह है ही नहीं है।
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