कौन है वह ?
कौन है वह जिस को हम अपना सभ कुछ,मैँ- कह कर पुकारते रहते हैं ?
वह यह शरीर और भोजन भी नहीं है,कियुँकि यह भी इक दिन साथ छोड़ जाएंगे ।
यह पानी और हवा भी नहीं हैं ,कियुँकि यह भी एक दिन बादल बन कर हवा के संग उड़ जाएंगे ,
तो फिर यह रौशनी है किया ? जो मेरी टार्च बन कर मुझे सारी कायनात के दर्शन कराती रहती है।
नहीं जी, यह सभ तो उस में रहने वाले पदार्थ और शक्तिआं ही हैं, जिन सभी का जोड़ हम सभ हैं। वह तो वह है, जिस में सारा ब्रह्म और उसकी सारी शक्तियां भी रहती हैं ,इसी लिए तो हम सभ भरम में जी रहे हैं,उस का कुछ भी नाम नहीं है, उसने सभ को रहने के लिए अपने में जगह दे रखी है। उसी जगह को हम निर अकार,सारे भरमों से परे, पार ब्रहम से पुकारते हैं । वह सिर्फ खाली जगह ही है जिस को खोजियों ने शून्यता/स्पेस के अनुभव से पुकारा है। मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा,तेरा तुझ को सौंप दें , किया लागे है मेरा----कबीर। अपना घुमान [ईगो] करना सरा सर मूर्खता है। हम कुछ भी तो नहीं हैं,सभ निम्रता से,ख़ुशी ख़ुशी से ,प्रेम भाव से, अपना जीवन निर्भाव करें ,इसी में सभ की भलाई है।
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