कुदरत और वातावरण।
कुदरत को जीतने की दौड़ में,ऐ मनुष्य , तूने वातावरण को दूषित व् जेह्रीला कर दिया,
न समझा तूने, कि तेरे को सवास देने वाली भी यही कुदरत ही है,वातावरण ही है।
कुदरत ने तेरे को धरती पर पैदा करके किया गुनाह कर लिया,
तूने इसको दूषित और जेह्रीला बना कर,दुसरे ग्रहों पर जाने के लिए ढूंढ़ना शुरू कर दिय।
तेरी यह समझ ही मेरे अनकूल नहीं है ,तुझे हवस ने खा लिया है शांति की तेरे में तलाश ही नहीं है ,अपने हंकार को बढ़ाने में लगा हुआ है ।,
जैसा करेगा वैसा ही भरेगा तू ,यह समझा न तूने,जनम से मरण तक, तेरे मन की हवस ने तुझे पागल कर दिया है।
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