दिव्या दृष्टि।
जब तक तुम्हारे मन में हैं यह वरन,जाती और धरम की दीवारें और नफ़रतें,तुम अंधे हो और वंचित हो उस दैवीय दृष्टि से, जो दर्शन करने के काबिल होती है उस राम के, जो तुम्हारे मन को बहलाने वाली तुम्हारे ही दवारा घडी गई पत्थर की मूर्ती नहीं है, लेकिन हर इंसान के शरीर में उसकी जान/आत्मा बन कर रह रही जीवन शक्ति है और जो इस स्पेस में सदा से परमात्मा रूप में रह रही है।
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