हमारी समझ।
हज़ारों, लाखों- मंदिर,मस्जिद,गिरजे गुरुदवारे तो बहुत बनते गए,
पर इंसान के मन की शान्ति मिटती गई,जो बने थे, सिर्फ इसी के लिए।
कियुँकि शांति पाने वाला मंदिर तो तुम्हारा ही अपना शरीर था ,
न कि यह ईटों,पथरों के मंदिर, जो बे तहाषा धन खरच करके,तुम्हें भूखा मार कर, बनाए गए।
यह सभ धर्मों का और सियासतदानों का तुम्हें भटकाने का धंदा है सिर्फ तुम्हारी वोटें लेने के लिए,
शान्ति तुम्हें मिलेगी,जब भी मिलेगी, सिर्फ तुम्हारे ही अपने शरीर में जिस में तुम्हारा ही बहकने वाला मन रहता है।
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