हमारी पढाई।
हम जितना मर्जी पढ़ लिख लें,जितनी मर्जी डिग्रियां ले लें,
जब तक अपने ही मन को नहीं पढ़ा और समझा सभ व्यर्थ है।
कियुँकि हमारा मन ही हमारे शरीर की गाडी का वह नशीला ड्राइवर है,
जो कभी भी और कहीं भी ना जाने इस गाडी की टकककर मार दे।
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