हमारा जीवन।
हम पिंजरे हैं हडियों के,जिन के ऊपर मॉस के वस्तर ओढ़ रखे हैं,
इन वस्त्रों में खून की नदियाँ बह रही हैं,वस्त्रों के सेलों को जिंदा रखने के लिये।
खून को भी जिन्दा रखने के लिए स्वासों की ऑक्सीजन इस में मिल रही है,
जिस के खून में ना होने से शरीर पैरालिसिस हो जाता है और सारी आकड़ चली जाती है।
शरीर के सेलों को जिन्दा रखने के लिए दिल का पंप दिन रात काम कर रहा है ,
शरीर की काम करने वाली शक्ति को पैदा करने के किये भोजन की आग जल रही है ,
यह आग जब बढ़ जाती है तो टेम्प्रेचर हो जाता है, ठंढी पड़ने लग जाती है तो बुढ़ापा आने लग जाता है,जब बुझ जाती है तो जीवन के सभ लफड़े ख़तम हो जाते हैं।
हमारा जीवन एक ऑटोमोबाइल इंजन की तरह है ,जब तक फ्यूल और कारबुरेटर से हवा/ऑक्सीजन मिलती और एग्जॉस्ट से धुंआ निकलता रहता है, इंजन आटोमेटिक चलता रहता है,कोई भी अड़चन आने पर इंजन रुक जाता है और शान्ति घट जाती है।
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