हमारे मन की उड़ान।
हम माटी के पुतले, पानी के बादलों यानि मन और भावों के पंख लगा कर जब एटमॉस्फेयर,सूर्या और ब्रह्म की तरफ उड़ान भरते है,तब आकाश में एक ऐसा ठंडा मंजिर भी आता है जहाँ से यह पंख ठन्डे हो कर,झड़ कर फिर पानी रूप में, पृथ्वी पर लोट आते हैं,
जानकार और गियानी पुरष, जीवन के सारे दुखों का कारन, इसी मन की उड़ान को ही जीवन के सारे दुखों का कारन का नाम -अहंकार और ईगो को कहते हैं।
इस लिए प्रकृति मां ने हमें बनाया ही इस लिए है,कि हम प्रकृति के बनाए हुए अपने धेरिया/धरम [नेचर]] को समझते हुए पृथ्वी पर रह कर ही,
ईमानदारी से,कोई पोल्लुशण ना पैदा करके,शुद्ध प्राकृतिक वनस्पति का हल्का भोजन खा कर, शुद्ध पानी पी कर,शुद्ध हवा से सवास ले कर और सूर्य की तेज गर्मी से बचने के लिए, दरख्तों की छाया,ऑक्सीजन और बादलों की क्षत्री का उपयोग करते हुए ही,मरते क्षण तक, अपना,सभ प्राणियों से प्रेम और सेवा भाव से शांत और सुखी जीवन जीते रहें।
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