Wednesday, December 19, 2012

धरम 
असली धरम इंसानियत है ,जीवों की सेवा है ,
जो आज कल बहुत कम नज़र आता है ,
बाकी तो सिर्फ एक दिखावा है ,सिर्फ छलावा है , 
कोई मंदिर जाके पूजा करने को धरम समझता है ,
कोई योग और मैडिटेशन करने को धरम समझता है ,
कोई तीरथ अशनान करने को धरम समझता है ,
कोई कथा सुनाने को अपना धरम समझता है ,
कोई आश्रम या मंदिर बनाने को धरम समझता है ,
कोई भगवें कपडे पहनने को धरम समझता है ,
धरम एक दुकानदारी बन गया है,अधरम बन गया है ,
किसी को अपने ही वातावरण ,जिसमें वेह रहता है ,
जिससे वेह साँस और प्राण लेता है ,पानी पीता है ,
की परवाह नहीं है और उसी को दूषित कर रहा है ,
इंसानियत और इसकी सेवा तो बहुत दूर की बात हो गई है।

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